मैं कौन हूँ
अम्मा कहती
तू मेरे जीवन मे
खुशियों की पेटी है
तू मेरी प्यारी सी बेटी है।
मेरे अरमानो की
चहकती चिड़िया है।
बाबा कहते
तू मेरी नटखट सी
गुड़िया है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
मैं कौन हूँ
अम्मा कहती
तू मेरे जीवन मे
खुशियों की पेटी है
तू मेरी प्यारी सी बेटी है।
मेरे अरमानो की
चहकती चिड़िया है।
बाबा कहते
तू मेरी नटखट सी
गुड़िया है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
गांव गई तो मुझे मिला
बाबा का घर
मिट्टी की दीवारें
खपरैल और छप्पर
खपरैल की मुंडेर पर
घड़े से बनी
कलशनुमा कलाकृति
घर को बनाती खूबसूरत,
घर अब घर नही
बल्कि कहलाता
बाबा की बखरी।
गांव की पहचान थी
वो बखरी
या यूं कहें कि गांव
उस बखरी के नाम से ही
जाना जाता था।
मेरा गांव
बाबा की बखरी।
बखरी में कई कमरे थे
हर कमरे में एक छोटा
परिवार रहता था
और हर कमरे का द्वार
आंगन में खुलता था।
हमारे शहर के फ्लैट से
बिल्कुल अलग
उस आंगन में सब का
भोजन एक साथ पकता था
और हर परिवार मिलकर
पकाता और खाता था
कहने को छोटे छोटे कई
परिवार थे
लेकिन वास्तव में सब एक ही
कड़ी से साकार थे।
एक बड़ा संयुक्त परिवार
हुआ करता था
हर सुख दुख आंगन में
बैठ बांट लिया करता था
जरूरत नही होती थी
किसी गैर को अपना
दुःख बयाँ करने की
क्योकि बखरी के अंदर
और बखरी के बाहर
सब अपने ही तो थे
कोई गैर नही था।
आज वो कड़ी
मेरे बाबा हमारे बीच नही है
और बाबा की बखरी खाली
वीरान पड़ी है।
क्योकि हम प्रगति कर गए है।
और हमने बना लिए हैं
अलग अलग घर।
बस नही बना पाए तो
वो कड़ी
वो बखरी
जैसे बाबा ने बनाई थी।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
मैं नन्ही मुस्कान तुम्हारी
मुस्कानों की वजह न छीनो,
सोन परी की कथा कहानी
नानी माँ की जुबां न छीनों।दादी दादा चाची चाचा
भइया भाभी काकी काका,
सांझ ढले आँगन मे जमघट
रिश्तों की मखमल गर्माहट।
जीवन मे नवप्राण भरे जो,
आँगन की वो हवा न छीनो।तुमने पगडंडी पर चलकर
खेतों की हरियाली देखी,
रिमझिम सावन की फुहार में
मदमाती पनियारी देखी।
सरसों के पीले फूलों से
धरती का श्रृंगार किया,
नन्हे मुस्काते बिरवे से
घर आँगन गुलजार किया।
फुलवारी में हरित कला की
बलखाती सी लता न छीनों।बरगद पत्थर पीपल पूजा
नीम आम से भरा बगीचा,
शीतल पवन चले पुरवाई
अमराई में रात बिताई।
उन रातों में खलिहानों की
रखवाली की सजा न छीनों।भेदभाव का भाव था गहरा
जात पात का कड़ा था पहरा,
फिर भी जब विपदा आती
दर्द में काया डूबी जाती ,
गांव समूचा मदद को आता
राहत की चादर दे जाता।
नींद मधुमयी आती फिर तो
हवा बसंती गाती फिर तो,
उन गांवों के अपनेपन की
ऐसी पावन फिजा न छीनों।कोयल कूके नित आंगन में
गौरैया की फुदकन घर में,
पंख फैलाये मोर नाचते
पपीहा गाये कुंज कानन में।
रात्रि अमावस में चंदा से
सूना होता है जब अम्बर,
धरती पर नन्हे दीपों की
जुगनू लहराते हैं चादर ।
दृश्य सुनहरे तुमने देखे
मुझसे उनका पता न छीनों।ताल तलैया पोखर सूखे
बदरा जैसे नभ से रूठे,
धूल भरा है शहर तुम्हारा
नभ से बरस रहा अंगारा।
छाया वाले पेड़ कट गए
पथिक राह में गिरे निपट गए।
छद्म क्षुधा की रार रही है
हवा जलाकर मार रही है।
प्रकृति कहती सुनो ध्यान से
वसुंधरा की धरा न छीनों।
मैं नन्ही मुस्कान तुम्हारी
मुस्कानों की वजह न छीनों।देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"