पीपल बरगद की छांव तले
चल चल बेटी चल गाँव चले।
मैंने जन्म गांव में पाया
पर तू शहर में आई है
शहर तो तुमने देख लिया
गाँव न जान पाई है।
रख चप्पल अपने पांव तले
चल चल बेटी चल गांव चले।
मिट्टी का कच्चा घर है
छत का सुंदर मंजर है
लाल भूरी सी खपरैलें
है कलश बने दो रुपहले।
बाहर का मजदूर न आया है
घर घरवालों ने बनाया है
मेहनत की खुशबू आती है
दीवारें महकी जाती है।
आंगन में है बनी रसोई
नित नए पकवान बने हैं
दादी अम्मा चाची भाभी
सबने सबके गान सुने हैं।
सांझ हुई लो चूल्हे जले
चल चल बेटी चल गांव चले।
द्वार नीम के पेड़ की
छाया बहुत घनी है
सुंदर कुआं सजा है
और एक बैठक बनी है।
आम का बाग एक
घर के पीछे बड़ा है
और तालाब भी है जो
मछलियों से भरा है।
खूंटे से लगी है देखो
दो बैलों की मनहर जोड़ी
गले में बंधी घंटिया बजे
सन्नाटे ने चुप्पी तोड़ी।
गइया कजरी शोर मचाती
भैंसे खड़ी चारा खाती
सुबह दूध पीने को देखो
बच्चों की टोली जुट जाती।
पहाड़ से सजे हैं गोबर के उपले
चल चल बेटी चल गांव चलें।
गलियारे गांव के हैं
सबके घरों तक जाते
सब हाल चाल लेते
सुख दुख में काम आते।
पगडंडियां बुलाती
खेतों में आती जाती
मेहनत जो रंग लाती
फसलें है लहलहाती।
जो फसल कट चुकी
खलिहान सज गए हैं
सब काम धाम सिमटा
दालान भर गए हैं।
अब बगिया में आम की
हर रोज होगी जमघट
फिर खेल कूद होंगे
चेहरों पे होगी रौनक।
आल्हा सुनेंगे बाबा,
काका बिरहा सुनाएंगे
बच्चे रामायण देखेंगे
चाचा चौपाई गाएंगे।
दुःख दूर खड़ा हो हाथ मले
चल चल बेटी चल गांव चलें।
चल देखने चलें हम
सिंचाई की कहानी
इंजन की गड़गड़ाहट
बोरिंग से बहता पानी।
हैं जलधार में नहाते
कुछ बच्चे नंगे पुंगे
आवाज गूंजती फिर
जय जय हर हर गंगे।
इस साल की शुरू है
फिर धान की रोपाई
खेतों में धान लगाती
लुगाइयाँ नजर आई।
घूंघट की आड़ में
जरा पहचानो कौन है
कौन गीत गा रही
कौन झूमकर मौन है।
धान रोपती कतारों के आगे पांव चलें
चल चल बेटी चल गांव चलें।
बरसात का महीना
पावन आ गया है
हवा के संग झूमकर
सावन आ गया है।
सब पत्ते धुल रहे हैं
हर शाख धुल रही है
बाबा की छान छप्पर
पुरानी चू रही है।
झूले पड़े हैं बाग में
सखियां चहक रही हैं
छाई है सोंधी खुशबू
धरती महक रही है।
झूला झूलने तो फिर उसी ठाँव चलें
चल चल बेटी चल गांव चलें।
यहां किसी का दुश्मन
न तो कोई गैर है
पूजा दुआएं मांगती
ईश्वर से सबकी खैर है।
बोली में शहद घुला
नयन में शिष्टता है
व्यवहार में सबकी
परिपूर्ण मानवता है।
देवों का सुंदर सपना
गांव है बिल्कुल अपना
यहीं जी भर के जीना
यही पे चाहूं मरना।
जब भी झांकू दिल में
यही मधुर मृदुभाव पले
चल चल बेटी चल गांव चलें।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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