Thursday, June 26, 2025

देखना क्या है?

जब मैं देखता हूँ
तो सोचता हूँ —
कि देखना क्या है?
क्या यह आँख की क्रिया है?
या मन की प्रतिक्रिया?
किसे देखता हूँ मैं?
उस दृश्य को?
या उस विचार को
जो दृश्य के पीछे खड़ा है?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि मैं खुद को देखता हूँ
हर देखे गए में?
हर चेहरा, हर छाया,
एक दर्पण है —
जिसमें मैं ही प्रतिध्वनित होता हूँ
हर बार, हर ओर।
और तब समझ आता है —
देखना सिर्फ बाहर का नहीं होता,
देखना एक यात्रा है
अंदर की ओर।

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