Sunday, April 26, 2026

अंधियारा

दिन में नहीं दिखाई देता,
रात में आता है बेचारा।
माँ मुझको एक टॉर्च दिला दो
मुझे देखना है अँधियारा।

सब कहते हैं काला-काला,
क्या इसके भी हाथ-पाँव हैं?
सूरज के जाते ही आता,
बड़ी निराली इसकी ठाँव है।

खिड़की के पीछे छिपता है,
या अलमारी के अंदर?
मैं इसको आज पकड़ लूँगा
बनकर छोटा सा बंदर।

जैसे ही मैं बटन दबाऊँ,
यह तो फौरन भाग गया।
शायद मेरी टॉर्च देख कर,
अँधियारा भी जाग गया!

माँ ने हँसकर समझाया,
अंधेरे से मत डरना लाल।
सूरज सोए, चाँद जगाए,
यही प्रकृति का है कमाल।

बिना रात के नींद न आती,
सपनों का सुख कौन चखाता?
अंधियारा प्यारा साथी है 
जो नया सवेरा लेकर आता।

जिज्ञासा मै जिज्ञासा

जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
नील गगन में उड़ना चाहूँ,
पूरी कर लूँ अभिलाषा।
जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।

सूरज इतना क्यों तपता है?
चंदा क्यों घटता-बढ़ता है?
बादल पानी कैसे लाते?
पंछी मीठे सुर क्यों गाते?
सुलझाऊँगी हर इक उलझन,
यही है मेरी परिभाषा!

जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
नील गगन में उड़ना चाहूँ,
पूरी कर लूँ अभिलाषा।

तितली के क्यों रंग सुहाने?
भँवरे गाते कौन तराने?
कलियाँ कैसे खिल जाती हैं?
मुझे जानने हैं अफसाने।
ज्ञान दीप मैं आज जलाऊँ,
छँट जाए सब दूर कुहासा!

जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।

खूब पढ़ूँगी, खूब लिखूँगी,
नई-नई बातें सीखूँगी।
पंख लगाकर मेहनत वाले,
ऊँचे पर्वत पर दिखूँगी।
साहस के संग बढ़ूँ निरंतर,
तज कर मन की हर निराशा!

जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
जिज्ञासा ...मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।