नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
नील गगन में उड़ना चाहूँ,
पूरी कर लूँ अभिलाषा।
जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
सूरज इतना क्यों तपता है?
चंदा क्यों घटता-बढ़ता है?
बादल पानी कैसे लाते?
पंछी मीठे सुर क्यों गाते?
सुलझाऊँगी हर इक उलझन,
यही है मेरी परिभाषा!
जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
नील गगन में उड़ना चाहूँ,
पूरी कर लूँ अभिलाषा।
तितली के क्यों रंग सुहाने?
भँवरे गाते कौन तराने?
कलियाँ कैसे खिल जाती हैं?
मुझे जानने हैं अफसाने।
ज्ञान दीप मैं आज जलाऊँ,
छँट जाए सब दूर कुहासा!
जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
खूब पढ़ूँगी, खूब लिखूँगी,
नई-नई बातें सीखूँगी।
पंख लगाकर मेहनत वाले,
ऊँचे पर्वत पर दिखूँगी।
साहस के संग बढ़ूँ निरंतर,
तज कर मन की हर निराशा!
जिज्ञासा मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
जिज्ञासा ...मैं जिज्ञासा,
नन्ही सी मैं जिज्ञासा।
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