नाम मेरा जिज्ञासा क्यों है।
यह श्रवण—
बस एक छिद्र है समय की दीवार में।
किस अनसुनी को पकड़ना है,
उस अभाव को, जो शब्द के गिरते ही बनता है?
मैं टोहता हूँ
अपनी देह के भीतर निर्वात को।
वह खालीपन ही मेरा पहचान है।
दृष्टि का व्यवधान
पड़ता है हर परिभाषा पर।
क्या देखना है, उस सतह के पार?
जहाँ मेरा होना केवल एक क्षणभंगुर विचार है।
प्रश्न? प्रश्न तो नहीं,
बस फिसलती हुई रेत है हथेली की।
यह अनवरत अन्वेषण—
जैसे एक अकेला पथिक
सहसा मुड़कर देखता है,
और पीछे कुछ नहीं मिलता।
जिज्ञासा? हाँ।
यही मेरा अंतिम निर्धार है।
क्योंकि सत्य अतीत में नहीं, आगामी पल में है।
और मैं खड़ा हूँ बीच में,
ध्वनि और मौन के अटूट पुल पर।
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