Sunday, May 25, 2025

है ही अस्तित्व है

फूल है 
गंध है
बाग है
बहार है
शब्द है
काव्य है
कलम है
दवात है
किताब है
ध्वनि है
गीत है
संगीत है
साज है।

ये है ही फूल है
है ही गंध है
ये है ही बाग है
है ही बहार है
है ही शब्द है
है ही काव्य है
है ही कलम है
है ही दवात है
है ही किताब है
है ही ध्वनि है
है ही गीत है
है ही संगीत है
है ही साज है
है ही परिधान है
है ही आभूषण है
है ही घर है
है ही मकान है।
है ही अस्तित्व है
अस्तित्व का प्रमान है
है ही ब्रह्म है
है ही भगवान है।

     -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Saturday, May 24, 2025

नाम मेरा जिज्ञासा क्यों है

सुनने की अभिलाषा क्यों है
नाम मेरा जिज्ञासा क्यों है।

यह श्रवण—
बस एक छिद्र है समय की दीवार में।
किस अनसुनी को पकड़ना है,
उस अभाव को, जो शब्द के गिरते ही बनता है?
​मैं टोहता हूँ
अपनी देह के भीतर निर्वात को।
वह खालीपन ही मेरा पहचान है।
​दृष्टि का व्यवधान
पड़ता है हर परिभाषा पर।
क्या देखना है, उस सतह के पार?
जहाँ मेरा होना केवल एक क्षणभंगुर विचार है।
​प्रश्न? प्रश्न तो नहीं,
बस फिसलती हुई रेत है हथेली की।
यह अनवरत अन्वेषण—
जैसे एक अकेला पथिक
सहसा मुड़कर देखता है,
और पीछे कुछ नहीं मिलता।
​जिज्ञासा? हाँ।
यही मेरा अंतिम निर्धार है।
क्योंकि सत्य अतीत में नहीं, आगामी पल में है।
और मैं खड़ा हूँ बीच में,
ध्वनि और मौन के अटूट पुल पर।

Thursday, May 22, 2025

अपना घर मैं बना लूँगी

घर की चौखट पर खड़ी
आकाश को निहारती
उड़ती पास आती
गौरैया को देखकर
कृत्रिम घोंसले की ओर
इशारा करती
अति उत्साहित प्रफुल्लित हो
जिज्ञासा ने
गौरैया से कहा
आओ गौरैया आओ
देखो अपना नया घर
मैंने तुम्हारे लिए
घोंसला बनाया है।
गौरैया बोली
सुन प्यारी
मेरे लिए घर मत बनाओ
मेरा बनाया घर ही मुझे भाता है
घोंसला बनाना अच्छी तरह से आता है।
तुम तो बस पेड़ बचाओ
जंगल उगाओ
जंगल और पेड़ बचे रहे
तो घोंसले और घर मैं
बना लूंगी।

Saturday, May 17, 2025

Friday, May 16, 2025

पेड़ लगाने दो

थोड़ी मिट्टी थोड़ा पानी 
थोड़ी हवा उगाने दो
पापा मुझे भी कुछ पेड़ लगाने दो।

बहुत गर्म है यह जलता शहर
पसीने से लथपथ सुबह दोपहर
बागों की शीतल छांव में जाने दो
अबकी गर्मियां गांव में बिताने दो।

पापा मुझे भी कुछ पेड़ लगाने दो।

                     -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'